इतना कहते ही आदित्य की आवाज फट गई। नहीं, वो रोना नहीं था। यारों वाला बाप रोता नहीं। बस उसकी आंखों में वो पहली 'नमी' थी, जो रिया ने अपनी जिंदगी में पहली बार देखी थी।
(शेयर कीजिए इस पोस्ट को हर उस बेटी के साथ जो शहर से दूर रहती है, और हर उस बाप के साथ जो बेटी को याद करके चुप रह जाता है।)
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आदित्य शर्मा को शहर के तमाम लोग 'लोहे का आदमी' कहते थे। जो इंसान बैंक की ऑडिट में भी नहीं डरता, जिसने कभी अपने ऑफिस में इमोशन नहीं दिखाया। रिया के लिए वो हमेशा एक सुपरहीरो थे—जो बाइक की चाबी छुपा देते थे, रात 10 बजे का कर्फ्यू सेट कर देते थे, और जिसकी एक आंख देखते ही सारे दोस्त पार्क से भाग जाते थे।
जाने से एक रात पहले, नॉर्मल ही डिनर चल रहा था। रिया मस्टू (घर के डॉगी) को बिस्किट खिला रही थी। तभी आदित्य ने बिना मुंह देखे कहा: "रिया, वो... ट्रेन में फास्टनिक्स मत लगाया करना, छीन लेते हैं लोग। और रात को लेट हो तो उबर शेयर नहीं करना।"
कहानी तब शुरू होती है जब रिया को मुंबई में एक जॉब ऑफर मिलता है। पूरे घर में खुशी थी, पर आदित्य के चेहरे पर वो मुस्कान थी जिसके पीछे एक चीख दबी थी।